Biography

Goswami Tulsidas – गोस्वामी तुलसीदास का जीवन परिचय और दोहे

Goswami Tulsidas भारत के एक महान संत थे। वह भगवान राम के भक्त थे। उनका जन्म 1540 में उत्तर प्रदेश के बांदा में हुआ था। उनके पिता का नाम Atmaram Dubey और माता का नाम Hulsi Dubey था। Ramcharitmanas, Dohavali, Kavitavali, Krishnagitavali, Ramalalachhu, Hanuman Chalisa, Vairagya Sandipani, Janaki Mangal, Parvatimangala, Vinayapatrika etc इत्यादि उनकी साहित्यिक रचनाएं थी ।

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उन्हें बचपन से ही काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। जब वह सिर्फ पांच साल के थे तब तुलसी के माता-पिता की मृत्यु हो गई। पेट भरने के लिए उन्हें खेतों में भीख मांगने और काम करना पड़ा।

Guru Nar Hari Das से मिलने के बाद तुलसी का जीवन बेहतर हो गया। अपने गुरु के नक्शेकदम पर चलते हुए, उन्होंने भगवान राम की पूजा शुरू कर दी। बाद में उन्होंने रत्नावली नामक एक खूबसूरत महिला से शादी कर ली। शादी के बाद, तुलसी दास अपनी पत्नी से इतना प्यार करने लगे कि वह भगवान राम के लिए अपना प्यार भूल जाते हैं। घर की ज़रूरतों की देखभाल भी उसने नहीं की। एक दिन, उसकी पत्नी को गुस्सा आ गया और उसने उससे कहा, “यदि आपने राम पर इस बात का आधा भी ध्यान दिया होता, तो आप उसे अब तक पा चुके होते ”।

इस वाक्य ने तुलसी दास को होश में ला दिया और उनका जीवन हमेशा के लिए बदल दिया। वह अयोध्या गए और राम के जीवन के महान महाकाव्य ‘रामचरितमानस’ को लिखा। उन्होंने इसे 1600 में पूरा किया। तुलसी दास ने कवितावली, विनयपत्रिका और गीतावली भी लिखी।

तुलसी दास ने अपना पूरा जीवन भगवान राम की पूजा में समर्पित कर दिया। उनकी भक्ति के गीत आज भी हर घर में गाए जाते हैं। 1623 में काशी में उनका निधन हो गया।

Goswami Tulsidas Ke Dohe

दोहा :- “दया धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान, तुलसी दया न छोडिये जब तक घट में प्राण |”

अर्थ :- तुलसीदास जी ने कहा की धर्म दया भावना से उत्पन्न होती और अभिमान तो केवल पाप को ही जन्म देता हैं, मनुष्य के शरीर में जब तक प्राण हैं तब तक दया भावना कभी नहीं छोड़नी चाहिए |

दोहा :- “सरनागत कहूँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि, ते नर पावॅर पापमय तिन्हहि बिलोकति हानि |”

अर्थ :- जो इन्सान अपने अहित का अनुमान करके शरण में आये हुए का त्याग कर देते हैं वे क्षुद्र और पापमय होते हैं. दरअसल, उनको देखना भी उचित नहीं होता |

दोहा :- “तुलसी मीठे बचन ते सुख उपजत चहुँ और, बसीकरण इक मंत्र हैं परिहरु बचन कठोर |”

अर्थ :- तुलसीदासजी कहते हैं की मीठे वचन सब और सुख फैलाते हैं. किसी को भी वश में करने का ये एक मंत्र होते हैं इसलिए मानव ने कठोर वचन छोड़कर मीठे बोलने का प्रयास करे |

दोहा :- “सचिव बैद गुरु तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस, राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास |”

अर्थ :- तुलसीदास जी कहते हैं की मंत्री वैद्य और गुरु, ये तीन यदि भय या लाभ की आशा से प्रिय बोलते हैं तो राज्य, शरीर एवं धर्म इन तीन का शीघ्र ही नाश हो जाता हैं |

दोहा :- रम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार तुलसी भीतर बाहेर हूँ जौं चाहसि उजिआर |”

अर्थ :- मनुष्य यदी तुम भीतर और बाहर दोनों ओर उजाला चाहते हो तो मुखीरूपी द्वार की जिभरुपी देहलीज पर राम-नामरूपी मणिदीप को रखो |

दोहा :- “मुखिया मुखु सो चाहिये खान पान कहूँ एक, पालड़ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित बिबेक |”

अर्थ :- मुखिया मुख के समान होना चाहिए जो खाने पिने को तो अकेला हैं, लेकिन विवेकपूर्वक सब अंगो का पालन पोषण करता हैं |

दोहा :- “नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु. जो सिमरत भयो भाँग ते तुलसी तुलसीदास |”

अर्थ :- राम का नाम कल्पतरु और कल्याण का निवास हैं, जिसको स्मरण करने से भाँग सा तुलसीदास भी तुलसी के समान पवित्र हो गया |

दोहा :- “सहज सुहृद गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानी, सो पछिताई अघाइ उर अवसि होई हित हानि |”

अर्थ :- स्वाभाविक ही हित चाहने वाले गुरु और स्वामी की सिख को जो सिर चढ़ाकर नहीं मानता, वह हृदय में खूब पछताता है और उसके हित की हानि अवश्य होती हैं |

दोहे :- “बिना तेज के पुरुष की अवशि अवज्ञा होय, आगि बुझे ज्यों राख की आप छुवै सब कोय |”

अर्थ :- तेजहीन व्यक्ति की बात को कोई भी व्यक्ति महत्व नहीं देता है, उसकी आज्ञा का पालन कोई नहीं करता है. ठीक वैसे ही जैसे, जब राख की आग बुझ जाती हैं, तो उसे हर कोई छुने लगता है |

दोहा :-“तुलसी साथी विपत्ति के विद्या विनय विवेक, साहस सुकृति सुसत्यव्रत राम भरोसे एक |”

अर्थ :- तुलसीदासजी कहते हैं की मुश्किल वक्त में ये चीजें मनुष्य का साथ देती है, ज्ञान, विनम्रता पूर्वक व्यवहार, विवेक, साहस, अच्छे कर्म, आपका सत्य और भगवान का नाम |

दोहा :- “सुर समर करनी करहीं कहि न जनावहिं आपु, विद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु |”

अर्थ :- शूरवीर तो युद्ध में शूरवीरता का कार्य करते हैं, कहकर अपने को नहीं जनाते. शत्रु को युद्ध में उपस्थित पा कर कायर ही अपने प्रताप की डिंग मारा करते हैं |

दोहा :- “तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर, सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि |”

अर्थ :- तुलसीदास जी कहते हैं कि सुंदर वेष देखकर न केवल मुर्ख अपितु चतुर मनुष्य भी धोखा खा जाते है. सुंदर मोर को ही देख लो उसका वचन तो अमृत के समान हैं लेकिन आहार साप का हैं |

दोहा :- “अस्थि चर्म मय देह यह, ता सों ऐसी प्रीति ! नेक जो होती राम से, तो काहे भव-भीत |”

अर्थ :- तुलसीदास जी कहते हैं कि यह मेरा शरीर तो चमड़े से बना हुआ है जो की नश्वर है फिर भी इस चमड़ी के प्रति इतनी मोह, अगर मेरा ध्यान छोड़कर राम नाम में ध्यान लगाते तो आप भवसागर से पार हो जाते |

दोहा :- “काम क्रोध मद लोभ की जौ लौं मन में खान, तौ लौं पण्डित मूरखौं तुलसी एक समान |”

अर्थ :- जब तक किसी भी व्यक्ति के मन में कामवासना की भावना, गुस्सा, अंहकार, लालच से भरा रहता है तबतक ज्ञानी और मुर्ख व्यक्ति में कोई अंतर नही होता है दोनों एक ही समान के होते है |

दोहा :- “सुख हरसहिं जड़ दुख विलखाहीं, दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं, धीरज धरहुं विवेक विचारी, छाड़ि सोच सकल हितकारी |”

अर्थ :- मुर्ख व्यक्ति दुःख के समय रोते बिलखते है सुख के समय अत्यधिक खुश हो जाते है जबकि धैर्यवान व्यक्ति दोनों ही समय में समान रहते है कठिन से कठिन समय में अपने धैर्य को नही खोते है और कठिनाई का डटकर मुकाबला करते है |

दोहा :- “करम प्रधान विस्व करि राखा, जो जस करई सो तस फलु चाखा |”

अर्थ :- ईश्वर ने इस संसार में कर्म को महत्ता दी है अर्थात जो जैसा कर्म करता है उसे वैसा ही फल भी भोगना पड़ेगा |

दोहा :- “तुलसी इस संसार में, भांति भांति के लोग, सबसे हस मिल बोलिए, नदी नाव संजोग |”

अर्थ :- तुलसी जी कहते है की इस संसार में तरह तरह के लोग है हमे सभी से प्यार के साथ मिलना जुलना चाहिए ठीक वैसे ही जैसे एक नौका नदी में प्यार के साथ सफर करते हुए दुसरे किनारे तक पहुच जाती है वैसे मनुष्य भी अपने इस सौम्य व्यवहार से भवसागर के उस पार अवश्य ही पहुच जायेगा |

दोहा :- “आगें कह मृदु वचन बनाई। पाछे अनहित मन कुटिलाई, जाकर चित अहिगत सम भाई, अस कुमित्र परिहरेहि भलाई |”

अर्थ :- तुलसी जी कहते है की ऐसे मित्र जो की आपके सामने बना बनाकर मीठा बोलता है और मन ही मन आपके लिए बुराई का भाव रखता है जिसका मन साँप के चाल के समान टेढ़ा हो ऐसे खराब मित्र का त्याग कर देने में ही भलाई है |

दोहा :- “तुलसी भरोसे राम के, निर्भय हो के सोए, अनहोनी होनी नही, होनी हो सो होए |”

अर्थ :- तुलसीदास जी कहते है की हमे भगवान आर भरोषा करते हुए बिना किसी डर के साथ निर्भय होकर रहना चाहिए और कुछ भी अनावश्यक नही होगा और अगर कुछ होना रहेगा तो वो होकर रहेगा इसलिए व्यर्थ चिंता किये बिना हमे ख़ुशी से जीवन व्यतीत करना चाहिए |

दोहा :- “काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पन्थ, सब परिहरि रघुवीरहि भजहु भजहि जेहि संत |”

अर्थ :- तुलसी जी कहते है की काम, क्रोध, लालच सब नर्क के रास्ते है इसलिए हमे इनको छोडकर ईश्वर की प्रार्थना करनी चाहिए जैसा की संत लोग करते है |

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