Biography

Vishnu Khare – Biography, Books And Poems

Vishnu Khare आधुनिक हिंदी – साहित्य की समकालीन कविता और आलोचना में विष्णु खरे एक विशिष्ट लेखक हैं । इनका जन्म सन् 1940 ई० में मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा नामक स्थान पर हुआ था । ये एक प्रतिभाशाली पुरुष हैं । इनकी प्रतिभा के आधार पर ही इनको रघुवीर सहाय सम्मान से अलंकृत किया । दिल्ली की हिंदी अकादमी ने इनको पुरस्कृत किया । इनको शिखर सम्मान , मैथिलीशरण गुप्त सम्मान , फिनलैंड का राष्ट्रीय सम्मान तथा  ‘ नाइट ऑफ दि ऑर्डर ऑफ दि व्हाइट रोज़ ‘ नामक सम्मान से सुशोभित किया जा चुका है । ये महान् साहित्यकार अपनी कुशलता के बल पर निरंतर हिंदी – साहित्य रूपी वृक्ष को ‘ अभिसिंचित कर रहा है ।

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Vishnu Khare Books And Poems

रचनाएँ – विष्णु खरे जी बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार हैं । इन्होंने अनेक विधाओं का प्रणयन किया है । इनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं –

  • कविता संग्रह – खुद अपनी आँख से , एक गैर रूमानी समय में , सबकी आवाज़ पर्दे में , पिछला बाकी ।
  • आलोचना – आलोचना की पहली किताब ।
  • सिने आलोचना – सिनेमा पढ़ने के तरीके ।
  • अनुवाद – मरुप्रदेश और अन्य कविताएँ ( टी० एस० इलियट ) , यह चाकू समय ( ॲतिला – योझेफ ) , कालेवाला ( फिनलैंड का राष्ट्रकाव्य )

Features Of Books And Poems

साहित्यिक विशेषताएँ – विष्णु खरे जी हिंदी – साहित्य के प्रमुख साहित्यकार माने जाते हैं । उन्होंने हिंदी – जगत् को अत्यंत गहन विचारपरक काव्य प्रदान किया है । इसके साथ – साथ अनेक आलोचनात्मक लेख भी लिखे हैं । उन्होंने विश्व साहित्य का गहन अध्ययन किया है । जो उनके रचनात्मक और आलोचनात्मक लेखन में विशेष रूप से दिखाई देता है । वे सिनेमा जगत् के गहन – जानकार हैं । वे सतत् सिनेमा की विधा पर गंभीर लेखन कर रहे हैं । सन् 1971 – 73 के विदेश प्रवास के दौरान उन्होंने तत्कालीन चेकोस्लोवाकिया की राजधानी प्राग के प्रतिष्ठित फ़िल्म के क्लब की सदस्यता प्राप्त कर के संसार की सैंकड़ों श्रेष्ठ फ़िल्में देखीं ।

ये साहित्य जगत के एक ऐसे साहित्यकार हैं , जिन्होंने फ़िल्मों को समाज , समय और विचारधारा के आलोक में देखा तथा इतिहास , संगीत अभिनय , निर्देशन की बारीकियों के सिलसिले में उसका विश्लेषण किया । उन्होंने सिनेमा लेखन को वैचारिक गरिमा और गंभीरता देने का सफर शुरू किया है । अपने लेखन के माध्यम से उन्होंने हिंदी के उस अभाव को थोड़ा भरने में सफलता पाई है जिसके बारे में अपनी एक किताब की भूमिका में उन्होंने लिखा है ” यह ठीक है कि अब भारत में भी सिनेमा के महत्त्व और शास्त्रीयता को पहचान लिया गया है और उसके सिद्धांतकार भी उभर आए हैं ।

लेकिन दुर्भाग्यवश जितना गंभीर काम हमारे सिनेमा पर यूरोप और अमेरिका में हो रहा है शायद उसका शतांश भी हमारे यहाँ नहीं है । हिंदी में सिनेमा के सिद्धांतों पर शायद ही कोई अच्छी मूल पुस्तक हो । हमारा लगभग पूरा समाज अभी भी सिनेमा जाने या देखने को एक हल्के अपराध की तरह देखता है ।

भाषा – शैली – विष्णु खरे ने अपने साहित्य – लेखन के लिए शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली भाषा को अपनाया है । इनकी भाषा प्रांजल भावानुकूल और सरल सरस है । तत्सम शब्दावली का प्रचुर प्रयोग है । इसके साथ – साथ तद्भव , उर्दू , अरबी , फारसी , अंग्रेजी तथा साधारण बोलचाल की भाषाओं के शब्दों का भी प्रयोग हुआ है । इन्होंने विभिन्न शैलियों का प्रयोग किया है । जिसमें वर्णनात्मक , विवरणात्मक , चित्रात्मक शैलियाँ प्रमुख हैं । मुहावरों और लोकोक्तियों के प्रयोग के कारण इनकी भाषा में विशेष निखार आ गया है ।

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